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दोहे 1 से 20 के भावार्थ

दोहे 1 से 20 के भावार्थ (Part 1)

Dohe 1 से 10 – सरल भावार्थ

Doha 1

"गुरु गोविंद दोऊ खड़े, का के लागूं पाय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो मिलाय।।"

इस दोहे में कबीर बताते हैं कि अगर Guru और God दोनों सामने हों, तो पहले किसे प्रणाम करें। यहाँ Kabir साफ कहते हैं कि पहले Guru को प्रणाम करना चाहिए क्योंकि उसी की वजह से हम God तक पहुँचते हैं।

Doha 2

"साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय। मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु ना भूखा जाय।।"

इस दोहे में संत कबीर संतुलित जीवन की बात करते हैं। वे कहते हैं कि भगवान इतना ही दें जिससे परिवार आराम से रह सके और किसी साधु, मेहमान या जरूरतमंद को भी भूखा न लौटाना पड़े। यह संतोष और संतुलन का संदेश देता है।

Doha 3

"बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।।"

कबीर कहते हैं कि केवल ऊँचा होना या बड़ा दिखना किसी काम का नहीं। जैसे खजूर का पेड़ ऊँचा तो होता है लेकिन न तो छाया देता है और न ही फल आसानी से मिलता है। मतलब बिना उपयोगी बने बड़ा होना व्यर्थ है।

Doha 4

"ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।"

इस दोहे में कबीर बताते हैं कि असली ज्ञान प्रेम में है। जो व्यक्ति प्रेम का सरल अर्थ समझ लेता है, वही असली ज्ञानी कहलाता है। ज्ञान का सार प्यार, दया और मानवता में है।

Doha 5

"चलती चाकी देख के, दिया कबीरा रोय। दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय।।"

कबीर इस दोहे में जीवन की कठोर सच्चाई बताते हैं। जैसे चक्की के दो पाटों के बीच कुछ भी साबुत नहीं बचता, वैसे ही दुनिया के दबाव और संघर्षों में भी इंसान पिस जाता है। इसलिए समझदारी और सावधानी जरूरी है।

Doha 6

"काल करै सो आज कर, आज करै सो अब। पल में प्रलय होएगी, बहुरि करैगा कब।।"

यह दोहा समय की महत्ता बताता है। कबीर कहते हैं कि कल पर भरोसा मत करो। जो काम करना है उसे आज ही पूरा करो। क्योंकि भविष्य अनिश्चित है, और समय कभी किसी का इंतजार नहीं करता।

Doha 7

"पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।"

इस दोहे में कबीर किताबों के सिर्फ रटने के बजाय असली समझ की बात करते हैं। वे कहते हैं कि सिर्फ किताबें पढ़ लेने से कोई पंडित नहीं बन जाता। असली ज्ञान प्रेम, सद्भाव और व्यवहार में है।

Doha 8

"माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोय। एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदूंगी तोय।।"

कबीर इस दोहे से जीवन की सच्चाई समझाते हैं। मिट्टी कुम्हार से कहती है कि आज तुम मुझे रौंद रहे हो, लेकिन एक दिन ऐसा आएगा जब मैं तुम्हें रौंद दूँगी, यानी मनुष्य भी मिट्टी में मिल जाता है। यह अहंकार छोड़ने का संदेश देता है।

Doha 9

"जहाँ ज्ञान तहाँ धैर्य है, जहाँ सत्य तहाँ नेह। जहाँ लोभ तहाँ पाप है, जहाँ क्षमा तहाँ देह।।"

यह दोहा जीवन मूल्यों पर आधारित है। कबीर कहते हैं कि जहाँ ज्ञान है वहाँ धैर्य है, जहाँ सत्य है वहाँ प्रेम है। लोभ पाप का कारण है और क्षमा से मन पवित्र होता है। यह इंसान को संतुलित और शांत जीवन की शिक्षा देता है।

Doha 10

"मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। कहै कबीर हरि पाइए, मन ही की परतीत।।"

इस दोहे में मन की शक्ति को बताया गया है। कबीर कहते हैं कि जो मन से हार मान लेता है, वह हार जाता है। जो मन से जीतने की सोच लेता है, उसकी जीत निश्चित होती है। सफलता मन की सोच से तय होती है।

Dohe 11 से 20 – सरल भावार्थ

Doha 11

"तिनका कबहुँ ना निंदिये, जो पावन तरु होय। कबहुँ उड़ आँखिन पड़े, पीर घनेरी होय।।"

इस दोहे में कबीर छोटी से छोटी चीज़ की भी निंदा न करने की सीख देते हैं। वे कहते हैं कि छोटा-सा तिनका भी अगर आँख में चला जाए, तो कितनी तकलीफ़ देता है। मतलब किसी को भी छोटा समझकर अपमान नहीं करना चाहिए।

Doha 12

"सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप। जाके हृदय सांच है, ताके हृदय आप।।"

कबीर कहते हैं कि सच बोलने से बड़ा कोई तप नहीं और झूठ बोलने से बड़ा कोई पाप नहीं। जिसके दिल में सच है, वहाँ भगवान स्वयं रहते हैं। यह जीवन में सत्य के महत्व पर जोर देता है।

Doha 13

"जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ। मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।।"

यह दोहा मेहनत और साहस की सीख देता है। कबीर कहते हैं कि जो लोग गहराई में उतरकर खोजते हैं, वही असली चीज़ पाते हैं। जो डरकर किनारे बैठ जाते हैं, उन्हें कुछ नहीं मिलता। जीवन में सफलता पाने के लिए मेहनत और जोखिम जरूरी है।

Doha 14

"हाथी चलै चमारियाँ, कुत्ता भौंके हजार। सोने से क्या डरिये, यों ही होती है भार।।"

कबीर बताते हैं कि बड़े लोग हमेशा अपने मार्ग पर चलते हैं। रास्ते में कोई कितना भी बोले या रोके, लेकिन जो सही दिशा में चलता है उसे डरना नहीं चाहिए। यह स्थिरता और आत्मविश्वास का संदेश है।

Doha 15

"ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय। औरन को सीतल करे, आपहुं सीतल होय।।"

यह दोहा मधुर वाणी की ताकत बताता है। कबीर कहते हैं कि हमें ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जिससे सामने वाले को शांति मिले और खुद का मन भी शांत रहे। मीठे शब्द हमेशा रिश्ते मजबूत करते हैं।

Doha 16

"दुःख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय। जो सुख में सुमिरन करे, दुःख काहे को होय।।"

इस दोहे में कबीर बताते हैं कि लोग दुख में तो भगवान को याद करते हैं, लेकिन सुख में भूल जाते हैं। अगर इंसान सुख में भी भगवान को याद करे, तो जीवन में बड़ी मुश्किलें नहीं आतीं। यह निरंतर श्रद्धा की सीख है।

Doha 17

"निंदक नियरि रखिये, आंगन कुटी छवाय। बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।।"

इस दोहे में कबीर निंदक यानी आलोचक के महत्व को बताते हैं। वे कहते हैं कि निंदक को पास रखना चाहिए, क्योंकि वह बिना साबुन-पानी के हमारे दोष बता देता है और हमें बेहतर बनाता है। यह सुधार और आत्म-विकास की सीख है।

Doha 18

"जा पर बिपदा पड़त है, सो आवत इकठ्ठा। धीरज, धारण, मित्र, अरु, धन, विद्या, बुद्धि, सुभट्ट।।"

कबीर कहते हैं कि जब किसी पर कठिन समय आता है, तब उसके धैर्य, साहस, मित्र, धन, ज्ञान और बुद्धि सभी की परीक्षा होती है। संकट समय में ही असली मूल्य और संबंध पहचाने जाते हैं।

Doha 19

"कबीरा धूप अघाय तूं, छाँव करे मनमाहिं। जो तू छाँवैं रहै, तौ नीचकु लागै साहिं।।"

कबीर इस दोहे में बताते हैं कि जीवन में आसानी की चाह रखना हमेशा ठीक नहीं। जैसे सिर्फ छाँव में रहने से इंसान कमजोर हो जाता है, उसी तरह संघर्ष से भागने पर व्यक्ति मजबूत नहीं बन पाता। धूप और छाँव दोनों जरूरी हैं।

Doha 20

"रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय।।"

हालाँकि यह दोहा रहीम का है, लेकिन कक्षा में अक्सर कबीर दोहों के साथ पढ़ाया जाता है। इसका भाव यह है कि प्रेम का रिश्ता बहुत नाज़ुक होता है। इसे तोड़ना नहीं चाहिए, क्योंकि टूटने पर यदि जुड़ भी जाए, तो भी गाँठ हमेशा रह जाती है। यह संबंधों की कोमलता और संभाल की सीख देता है।